संगीत सम्मलेन भाग ४ (आखिरी )

उदार दिल रमेश भाई ने मध्यांतर के लिए १० मिनट का समय दिया था वो उन लोगो के लिए था जिनके दिलको कचौड़ी आ ज तक छू नहीं पायी  थी । ३० मिनट तक खुली हवा में घूमते रहना तो बनता ही था।  एक के बाद एक ६ बार रमेश भाई के आग्रह को सन्मान देते हुए हामरे श्रोताओ सभागृह में प्रवेश करने लगे। 

“जिग्नेश भाई मध्यांतर के बाद आप तो पोग्राम देखने अंदर पधार रहे है ना?”  ५० से ऊपर उम्र लेकिन बाल कोयले की तरह काले ऐसे खुश मिजाज सेवंती लाल बोले ? गुणीजन होने का दावा करने वाले जिग्नेश भाई कुछ बताये इस से पहले मृणालिनी, सेवंतलाल की पत्नी ने उत्तर देना उचित समझा, ” बिलकुल पधारेंगे जिग्नेश भाई, हमारे पोते पार्थ को जो प्राइज़ मिलने वाला जो है ” 

मृणालिनी ने यकायक ऊँगली पकड़ पीछे चलने वाला  पार्थ, जो बेचारा कुल्फी कॉर्नर को बड़े चाव से देख रहा था , उसको आगे कर दिया, “नमस्ते करो बेटा अंकल और आंटी को” 

“नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी” 

“क्यों नहीं क्यों नहीं? अरे, कितना बड़ा हो गया ये? बहुत प्यारा बच्चा है। जब से हमारे सेवँतीलाल  साहब चेंबर ऑफ़ कॉमर्स के प्रेसिडेंट जो बने है आप लोग तो बस आते ही कहाँ हो?” जिगनेश भाई की पत्नी ने पार्थ के गाल को हलके से थप थपाया।

अब ये मत पूछिए की उत्तर भारत की मृणालिनी देवी किस तरह सेवँतीलाल की अर्धांगना बनी – यह लव स्टोरी किसी दिन जरूर बताऊंगा, लेकिन इनकी वजह से शहर की सभी महिलाओ को हिंदी में बात करना बनता था।  

“अरे क्या  बताऊं बहनजी, मन तो बहुत करता है पर इनको  टाइम ही कहाँ ? ” मृणालिनी का सेवँतीलाल की और मीठा गुस्सा! 

रमेश राठोड की आग्रहभरी आवाज हॉल में गूँज उठी। बेचारे जिग्नेशभाई! मध्यांतर के पश्चात वहां अड़े रहना टालना चाहते हुए भी सेवँतीलाल जैसे बिज़नेस मैन को भला कैसे टाल सकते थे? आखिर बिज़नेस बिरादरी में कौन माइका लाल ऐसे सोच भी सकता था? 

लेकिन कचौड़ी दबानेके पश्चात कुछ बहादुर बन्दे थे जिन्हें हॉल में वापस आनेकी जल्दी थी। आखिर उनके बेटे बेटिओं

 को प्राइस जो मिलनेवाला था ! याद रहें जो नहीं आए उन सबों को घर में इम्पोर्टेन्ट गेस्ट थे। तभी तो ! 

चलिए ग्रीन रूम में उस्तादों का क्या हाल था? अनगिनत कचौड़ी प्लेट्स  खाने के बाद वो ठुमरी और भैरवी बजानेके लिए बुलावे के इंतजार में, चुप चाप। 

ऑर्गेनिजर्स  बड़ी उलझन में। कड़ी मेहनत के फलस्वरूप एक तगड़ा सा डोनेशन द्वारा आदरणीय हंसराज भाई को चीफ गेस्ट बनाके लाये थे लेकिन विधाता को ये मंजूर  कहाँ? हादसे के बाद वो अपने घर में अपने सेवक से रिक्लाइनिंग कुर्शी में बैठे बैठे मालिश करवा रहें थे।  

अब बहस ये हो रही थी की चीफ गेस्ट की जगह किसको दिया जाय जिनके कर कमलों से प्राइज़ वितरण किया जाय।  समय निकला जा रहा था। रात के दस बजने में चंद मिनट्स बाकी! 

आखिर सेवँतीलाल मान ही गए चीफ गेस्ट की जगह पर बैठने के लिए – उन्होंने डोनेशन कितना दिया वो अगले साल की जनरल मीटिंग में बताया जाएगा। 

सेवँतीलाल खुश और जाहिर है मृणालिनी देवी अधिकतर खुश। 

जब पर्दा  खुला  तो हॉल में २५ – ३० उपस्थित। पहली दो रोज़ में समा गए। सभी आतुर। स्टेज पे कुछ कुर्सियां और आगे एक लंबा सा टेबल, जिसके ऊपर २५ छोटी बड़ी चमकती ट्रॉफियां।  

रमेश भाई फिर एक और बार माइक पे नज़र आये। 

“लेडीज़ एन्ड जेंटल  मैन, क्षमा चाहते है हम। सबसे पहले दो जरूरी सूचनाएं । 

जिग्नेश भाई सोचने लगे “कही मेरी गाडी सेवंती लाल की गाडी को ब्लॉक तो नहीं कर रही है?”

‘रमेश राठोड की अदा का क्या कहना? ” हमें बड़ा अफ़सोस है की समय बहुत व्यतीत हो गया है और अभी अभी खबर आईं है के संगीत प्रोग्राम वगैरा रात के दस के बाद चालु रखना कानूनन अपराध बनता है।  हमें यकीन है के दोनों उस्तादों को सुन ने का मौक़ा हम जल्द लेके आएंगे।” 

यह सुन कर मुश्कीलसे दो सच्चे गुणीजन बैठे हुए थे वो हॉल से निकल गए – साथ मैं बड़ी पर्स वाली महिला शामिल। 

“दूसरी सूचना – आप सबों को बताते हुए हमें बड़ी ख़ुशी हो रही है के प्राइज़ वितरण के लिए हमारे अपने श्री सेवँतीलाल ने हामी भर दी है।” फिर बड़ी कुर्शी पे बैठे  सेवँतीलाल की और देखते हुए “संस्कारी नगरी की पूरी जनता की और से हम आपका अभिवादन करते है” 

चीफ गेस्ट ने हॉल मैं बैठे ‘गुणीजनों’ को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। हॉल में केवल दो ही रो में गुजीजन बैठे थे।  मृणालिनी देवी ने गुरूर से चारों और नज़र घुमाई। पार्थ ने उठ कर तालियां बजाकर   अपने पूज्य पिता का हौंसला बढ़ाया। 

रमेश फिर चले ” और हाँ , कमेटी ने इस बार तय किया है की कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने वाले सभी बच्चों को कंसोलेशन प्राइज़ देना बनता है। ये सुझाव हमारे सबके चहिते स्थानीय संगीतकार श्री सुरेश भाई की और से आया था।  “

स्टेज के पीछे एक कोने में  बैठे संगीतज्ञ सुरेश भाई ने फीका सा हाथ हिलाया। 

” तो दोस्तों, अब इंतज़ार की घड़ियां ख़तम हुई।  

टॉप प्राइज़ जीतने वाली है —————————-नन्ही सी नंदिनी !” 

बिलकुल इसी वक्त चीफ गेस्ट की बगल मैं बैठे वाइस चेरमेन ने सेवँतीलाला के कान में कुछ कहना मुनासिब समझा।  श्रोता गण को हमेशा ये नज़ारा बड़ा गहन लगता है की न जाने ऐसी कौनसी बात होती है जो स्टेज पे बैठे महानुभाब को कान में कहनी होती है। बड़ी इम्पोर्टेन्ट होगी बात। 

तालियां। 

वो नन्हीसी नंदिनी स्टेज पे एक गलत कोने सी निकली और सीधी  सुरेशभाई, के सामने जा कर खड़ी हो गयी। आखिर वो तो अपने गुरु को ही पहचानेगी!  वाइस चेरमेन कुछ बौखला गए, उन्होंने नंदिनी का हाथ पकड़ उसको चीफ गेस्ट के सामने खड़ा  कर दिया।  नंदिनी ने श्रोता गण की और देख कर मुस्कुरा कर नमस्कार किया। 

फोटू खींचने वाले महाशय दौड़ते  हुए आये, एक खाली कुर्शी को घसीट कर पास ला कर ऊपर चढ़ गए और केमेरा फोकस किया तब चीफ गेस्ट उठे और नंदिनी को टॉप प्राइज़ प्रदान किया। 

“और अब, फर्स्ट रनर्स अप प्राइज —— पार्थ, आ जाओ बेटा” 

हॉल तालियों से गूँज उठा। 

बनारसी साडी और गहनों से सजी मृणालिनी देवी अपनी जगह खड़ी हो गयी और एक यादगार तस्वीर खिंच ही ली अपने लाडले बेटे को अपने पिता से प्राइज़ लेते हुए । वो बैठी तब तलक  तालियां गूंजती रही। सभी लेडीज़ के अभिवादन स्वीकार करते करते बेचारी थक गयी। 

“अरे कॉम्पिटिशन के दिन बेचारे पार्थु को गले मैं इंफेक्शन हो गया था न? ये नंदिनी फंदिनी का क्या क्लास?” 

“सही बात है मृणालिनी देवी जी, कहाँ आपके पार्थ की बनारसी  गायकी और कहाँ ये सब ? ” जिग्नेश की पत्नी ने सुर मिलाया । मन ही मन उसने सेवँतीलाल -मृणालिनी को सह परिवार खाने पे बुलाने का प्लान बना दिया। 

प्राइज़ वितरण पूरे ४५ मिनट चलता रहा।  फिर हुई  चीफ गेस्ट की स्पीच, वाइस चेरमेन  का वोट ऑफ़ थेंक्स , आखिर मैं सब ने गले मिल कर अगले साल और अच्छा प्रदर्शन करनेकी कसम।   

कलाकारों को इज्जत से शहर की ३ स्टार होटल में पहुंचाया गया जहां होटल के रेस्टोरेंट में जो भी शाकाहारी खाना मिला वो दबा के सो गए। 

संगीत सम्मलेन की पूर्णाहुति पर बेजान हॉल की सफाई करते  युगल के होठों पर एक ही गीत था ” दुःख भरे दिन बीते  रे भैया अब सुख आयो रे—“

Read previous 3 Parts in Hindi by clicking following links:

https://rajendranaik.com/2020/07/18/संगीत-सम्मेलन/ Part 1

https://rajendranaik.com/2020/07/21/संगीत-सम्मलेन-भाग-2/

https://rajendranaik.com/2020/07/31/संगीत-सम्मलेन-भाग-३/


4 thoughts on “संगीत सम्मलेन भाग ४ (आखिरी )

  1. The story is not real but through the story I have tried to present the picture of a typical Sangeet Sammelan. The satire is on everyone – the organizers, the audience, the artistes and many more

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