संगीत सम्मेलन – सम्पूर्ण कहानी

शहर के रईस इलाके में स्थित हॉल आहिस्ता आहिस्ता भरा जा रहा था

” अरे मोहन भाई, क्या बात है? आप और यहां? क्लासिकल संगीत प्रोग्राम एटेंड करने आये है? “

मोहन भाई मुस्कुराये ” नहीं जी , में तो मेरे साले बंधू रमेश भाई को मिलने आया था तो उन्होंने कहा आ जाईये । रमेश भाई को आप जानते हो ना? क्लासिकल में उनको काफी दिलचस्पी है, में तो ठीक हूँ “
“अरे रमेश भाई को कौन नहीं जानता? वो तो ये संगीत सम्मेलन की शान है जी। चलो आप आ गए तो अच्छा हुआ । सुविख्यात सारंगी वादक मोहमद खान को सुन ने का मौका मिलेगा आपको, और साथ में जाने माने तबला वादक असलम खान भी तो है?”
“हाँ जी, बिलकुल; लेकिन में इनमेसे किसीको नहीं जानत। क्लासिकल में इतनी समझ नहीं है मेरी । यही कोशिश में हूँ की मेरे जाने पहचाने दोस्त या रिश्तेदार मिल जाए। ” मोहन भाई ने चारों और नज़र घुमायी ।

उधर ग्रीन रूम में एक और तमाशा जारी था:
सारंगी उस्ताद मोहमद खान कुच्छ बिगड़े हुए मिज़ाज में थे । सारंगी की दर्जन तारो को मिलाने में अनहद कठिनाई हो रही थी उन्हें।
“अरे सुनो तो ” मोहमद खान ने चाय की कितली ले के जा रहे लड़के को बुलाया ” देखो ये एयर कंडीशनर को तनिक बांध करवा दीजिये”
“में अभी एलेक्ट्रिसिअन को खबर करता हूँ ” इतना कहके लड़का निकल गया
असलम खान जो अभी तक अपने तबले को हथोड़ी सी ट्यून कर रहे थे वो बोले ” अरे उस्तादजी ये तो चाय वाला है । में अभी रमेश भाई को सीधा “काल” करता हूँ और चुटकी में आपका काम हो जाएगा”‘

कॉन्सर्ट हाल में इतना शोर था तो रमेश भाई को फोन कैसे सुनायी देगा?

“अरे छोडो ये सब, असलमभाई, ये सब ऐसे ही है । इनको कहाँ अच्छे संगीत की कदर है ? देखिये न हमारे जैसे उच्च कोटि के कलाकार के साथ कैसा सलूक कर रहे है ये लोग ? मैने तो तय कर लिया है आज में डेढ़ घंटा ही बजाऊंगा और निकल जाऊँगा। “

“ठीक है उस्ताद जी , जैसा आप कहें”

“और एक बात, असलम भाई । ऐसे लोगो को आप प्रभावित करने की कोशिश बिलकुल ना करें । वो लोग को कोई कदर नहीं है। बस अपना ठेका लगाते रहो और में जब इशारा करुँ तो मार देना कोई अपनी चीज़ “

“जैसा आप कहें ” असलम भाई कुछ मुरझा गए ।

‘और ये आपके बाए हाथ में पट्टी क्यों बाँध रखी है? “
“क्या ये? कुच्छ नहीं हुआ है मुझे । ये तो बस ऐसे ही।।।।।।। कई बार करता हूँ ” असलम भाई की नज़ार झुक गयी
“अच्छा तो पब्लिक को ये लगे की आपको इतना दर्द हो रहा है फिर भी बजा रहे हो। क्या सोचते हो? पब्लिक ताली बजाएगी ?

“बरखुरदार निकालो ये सब, नखरा छोडो और सीधे सीधे बजा कर निकल जाएँ , समझे?” अब असलम बेचारा क्या बोलता ?

दोनों ने कुच्छ देर तक रियाज़ किया। चार पांच कप चाय के बाद ऑर्गेनाइज़र के बुलावे का इंतज़ार करने लगे।

अब हम चलें ‘हाल’ की और:

हाल में धीरे धीरे लोग आते दिखाई दिए । चीफ गेस्ट का इंतज़ार हो रहा थ।

फ्रंट रो में बैठे मोहन भाई की नज़र अचानक बीच वाली रो में बिराजमान जिग्नेश भाई पे पड़ी। ” जिग्नेशभाई शहर के एक सुविख्यात बिज़नेस में थे । दूध जैसी श्वेत कुर्ते पायजामे पहने हुए, कंधे पे एक महँगी वाली शाल स्टाइल में ओढ़े हुए जिग्नेशभाई ने मोहन भाई को उनकी और हाथ हिलाते दिखाई दिए तो अपनी पत्नी से कहा ‘ अरे ये तो मोहन भाई है; तू जानती तो है ना? “
उनकी पत्नी कोई मोटी सी औरत के साथ बात चीत में लगी हुई थी।
“तो आप चलें जाइए न वहाँ?”
जिग्नेष भाई का लिबाश ऐसा था के लोगो को लगे के शायद यही है वो आर्टिस्ट जो बजाने वाले है। दुसरे बैठे हुए लोगो को हटाते हटाते जिग्नेशभाई पहुंचे रमेशभाई के पास।
‘जय श्री कृष्णा, मोहन भाई” जिग्नेशभाई ने उनको गले लगाया ।
“अरे क्या कहना आपके लिबास का, बिलकुल आर्टिस्ट लगते हैं । आप भी कोई आइटम पेश करने वाले है ?”
मोहनभाई ने जिग्नेशभाई को कोई स्थानिक प्रोग्राम में एकाद फ़िल्मी गीत गाते सुन लिया था, तो उनको भगवान् कसम ऐसा लगा की ये कोई ऐसा वैसा ही प्रोग्राम होगा जहां पे एक के बाद एक गाने वाले आएंगे और अपनी ‘कला’ प्रस्र्तुत करेंगे ।
“मोहनभाई क्यों मेरी मजाक उड़ा रहे हो?” जिग्नेशभाई ने जूठा गुस्स्सा किया।

अब आइये स्टेज पर जहां पर्दा खुल रहा था। स्टेज पे कुछ कुर्सियां लगाई हुई थी
“अच्छा तो जिग्नेशभाई इंटरवल में जरूर मिलेंगे और बहुत सारी बातें करेंगे । यहां के स्टॉल में कचौड़ियां बहुत अच्छी मिलती है वो जरूर खाना। इतनी मज़ेदार है की आप अपने वो नुक्कड़ वाले की कचौड़ी भूल जाएंगे “
स्टेज पे दोनों कलाकार बिराजमान थे। उनको बिलकुल पता था की ये गेस्ट को वेलकम करने की विधि बहुत लम्बी चलने वाली है । मोहमद खान ने हाल में बैठे हुए लोगो को देख कर अपना सर हिलाया।

रमेश राठोड उठे और माइक की और प्रस्थान किया

“प्रोग्राम कुछ ही क्षणो में आरम्भ होग। आप सभी को मेरा ये आग्रह है की अपना अपना स्थान ग्रहण कर ले। हमें बस अब इंतज़ार है तो हमारे सब के चहिते हंस राज भाई के पधारनेका “
एक स्वयंसेवक ने आ कर रमेश भाई के कान में कुछ कहाँ जिस की वजह से रमेशभाई हर्षोल्लित हो गए
“आप सभी को जान कर ख़ुशी होगी के हमारे चहिते हंस राज भाई का आगमन परिसर में हो चूका है _” इतना कह कर वो स्टेज के साइड प्रवेश की और भागे।
बड़ी इज्जत के साथ विस्तृत काया धारी हंसराज भाई स्टेज पे प्रगट हुए और सबको नमस्कार करते हुए मुख्य कुर्सी पे बिराजमान हुए ; प्रसन्न मुद्रा में उनकी नज़र पूरे हाल में फ़ैल गयी
रमेशभाई के इशारे पर हाल में बिराजमान सभी लोगों ने ताली बजाकर चीफ गेस्ट का अभिवादन किया
हंसराज भाई की विस्तृत काया को छोटी सी कुर्सी में फिट होने पे कुछ दिक्कत तो हुई लेकिन उनके चेहरे पर मुस्कराहट बरकरार

फिर तो उनका आशीर्वाद पाने की धारा अविरत शुरू हो गयी । चेरमैन, वाइस चेरमैन, सेक्रेटरी, डेपुटी सेक्रेटरी, खजांची, सब के सब निकल पड़े, चीफ गेस्ट के पास जाके अदब से झुके और फोटोग्राफर फोटो खींचता है वो कन्फर्म करने के बाद ही उठे वहां से
दोनों कलाकार ये नज़ारा देखके मुस्कुराये
फिट दौर शुरू हुआ दुसरे सब गेस्ट का फूलों से अभिवादन करनेका और इस बार ऑफिस बेरर की पत्नीयां तैयार !
हंसराज भाई बैठे बेहरे मुस्कुराते गए और सभा में बैठे हुए उनके दोस्त- जो भी नज़र में आ जाए उनकी और हाथ हिलाते रहे

आखिर में आया वक्त कलाकारों के अभिवादन का
छोटी छोटी बालाएं आ कर एक के बाद एक दोनों कलाकार को बड़ा सा गुलदस्ता दे कर वापस हो गयी।
मोहमद खान और असलम खान बेचारे अपने साज को संभाल ते हुए उठे और गुलदस्ता स्वीकार किय।

फिर क्या था?

रमेश भाई ने माइक को एक बार फिर सम्भाला और कलाकार के परिचय का दौर शुरू हुआ ; वो कलाकार “जिनके परिचय की कोई आवश्यकता नहीं है” !”

Part 2:

छोटे शहरों की बात कुछ अलग होती है, उनकी समस्याएं भी अजीब। 

बड़े उत्साह में रमेश भाई बोलने खड़े हुए की लाइट डूल ! पब्लिक को और मज़ा ! धुँधले प्रकाश में कुछ लोग खड़े हो गए । सिटीआं बजनी शुरू हो गयी । सर्वत्र आनंद  ही आनंद। 

स्टेज पर चीफ गेस्ट हंसराज भाई और अन्य ख़ास मेहमान अपनी जगह पे बैठे रह।  ऑर्गेनाइजर्स को गेस्ट की बहुत फ़िक्र थी । 

“अरे कोई हॉल  के मैनेजर को खबर करो की जनरेटर चालु करें ” वाइस चेरमेन विवेक भगत जी फरमान छेड़ा। 

इस हल्ले के माहौल में स्टेज ऊपर कोई बड़ी चीज़ गिरनेकी आवाज़ आयी । एक वॉलंटिअर हाथ में बड़ी सी टोर्च लेके स्टेज पे हाजिर। देखा तो आदरणीय चीफ गेस्ट कुर्सी से निचे गिर पड़े थ।  बड़ी मुश्किल से उन्होंने कुर्सी में अपने आपको फिट किया था तो ये तो होना ही था। 

लाइट  किसी तरह वापस आ गयी।  श्रोता गण ने देखा की चीफ गेस्ट को बड़े आदर से सपोर्ट दे कर  स्टेज से बाहर लिआ जा रहा था 

रमेश भाई फिर से अपनी प्रिय ड्यूटी पे !

“प्रिय श्रोता गण से मेरा आग्रह है को अपना स्थान ग्रहण कर लें। शान्ति बनाए रखें। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड वालोने हमें आश्वासन दिया है की अब सब ठीक है। दोस्तों, एक ही छोटा सा प्रॉब्लम है। ——— ” कुछ रूक कर ” अब ऐसी नहीं चला पाएंगे। थेंक्स फॉर योर कॉपरेशन। थेंक यु। थेंक यु। थेंक यु। ” स्टेज पे कलाकार अपने अपने बाज को अपनी गोद में समाये बैठे रहे थे – ताकि अफरा तफरी में कोई उनके साज को हानि न पहुंचा दे।

“हम सब प्रार्थना  करें की आदरणीय हंसराज भाई खुशहाल रहें” रमेशभाई माइक पे लगे रहे।  

“चलो जो हुआ वो ठीक ही हुआ।  आगे वाली सीट से किसीने कहा। 

“ये लाइट कभी शनिवार को जाती नहि है ये शहर में ” जिग्नेश भाई ने मोहन भाई को बताय।  अब मोहन भाई को लाइट जाने के टाइम टेबल में क्या दिलचस्पी ?

अपनी ड्यूटी निभाते हुए रमेश राठोड ने अपने चश्मे लगाए और शुरू ” प्रिय श्रोता मित्रों, हमारी ये खुशनसीबी है के आज हमारे मनोरंजन हेतु, माँ सरस्वती के आशीर्वाद से हिन्दुस्तांन के सुबिख्यात सारंगी वादक उस्ताद मोहमद खान पधारे हैं। आप बिहार घराने के प्रसिद्ध सारंगी वादक उस्ताद अहमदखां के शिष्य है।________”

पास में बैठे हुए उस्ताद मोहमद  खान ने कुछ इशारा किया तो रमेशभाई ने गलती सुधार ली ‘ माफ़ कीजियेगा, मेरा मतलब है मैहर घराने के उस्ताद 

अहमदखां।  उस्ताद मोहमद खान ने दस बरस की बाली उम्र में अपना पहला पब्लिक प्रोग्राम दिया और देश विदेश में अनगिनत प्रोग्राम किये हैं।  

और ख़ुशी की बात ये है के उनके साथ हैं तबले पे उस्ताद असलमखान।  एक हैरानी की बात ये है की हॉल पे यहां आते आते उनका एक्सीडेंट हो गया।   बांये हाथ में चोट आयी है लेकिन फिर भी वो आज बजा लेंगे। “

मोहमदखा ने असलम की और तीखी नज़र फेंकी; घायल असलम बेचारा।  पब्लिक ने खड़े हो कर तालिआं बजायी।  असलम ने तो प्रोग्राम शुरू करने से पहले ही बाजी मार ली। “बेवकूफ”, मोहमद खान ने नकली स्मित कर  ताली बजाते असलम को सुना दी।  

रमेश भाई ” उस्ताद जी शाम का राग यमन पेश करेंगे”

श्रोताओं में से कुछ गुणीजन के मुख से यमन राग का नाम सुन कर ‘आह’ निकल गयी। 

हमारे जिग्नेशभाई के बगल में बायीं और एक विद्वान सा गुणीजन बैठा था उनके कान में पूछने लगे “यमन राग में कौनसा फ़िल्मी गाना है?”

वो असली  में मराठी गुणीजन निकले ” काय रे भाउ,  एवढं पण माहित नाही का ? ” जिग्नेश बेचारा चुप। 

दायीं और बैठे मोहन भाई को बाहर फॉयर से कचौड़ी की खुशबू आने लगी थी  – मन मोर नाच उठा था उनका। 

अब शुरू हुई साज को ट्यून करने की विधि।   इतने सारे पंखे की आवाज से उनको ट्यून करनेमे कठिनाई हो रही थी। 

” जिग्नेशभाई, ये लोग पहले से अपने साज को ट्यून कर के क्यों नहीं आते ?” मोहन भाई को ये जो प्रश्न मन  में आया वो कई अन्य लोगो के मन में अवश्य आता होगा। 

” ग्रेट ट्रेडिशन, शास्त्रीय संगीत की ये धरोहर है, मोहन भाई , बस देखते जाओ, आनंद लो ” गुणीजन जिग्नेश ने समाधान किया। 

” श श श    ” मराठी गुणीजन ने दोनोको चुप करा दिय। 

“आज यहां हमारा कुछ होने वाला नहि है, मोहमद भाई” स्टेज पर असलम बोले 

“तू अपना ठेका  पकड़के बैठ, बोला ना तेरेको?”

“लेकिन मेरी हथौड़ी नहि मिल रही है, भाई” 

देखने वालों को ये अजीब जुगल बंदी की पता न चले इस लिए अपने चेहरे पे एक नकली स्मित बना कर  मोहमद खान ने सुनाया ” तो अपना सर पटक।  एक तो दिखावे के लिए हाथ पे पट्टी लगा कर चले आया, रमेश भाई को बता भी दिया और अब ये तमाशा !” 

असलम खान सहम गए लेकिन दूसरी क्षण में अपने मोटी सी बेग के नीचे से हथौड़ी मिल गयी। उसने मोहमद खान की और सर हिलाया 

“अब चालू करो ” श्रोता गण में से पीछे से कोई चिल्लाया 

रमेश राठोड, जो जानते थे की ऐसे उपद्रवी लोग कुछ शोर करेंगे वो पीछे की और खड़े थे।  उन्होंने ने चिल्लाने वाले के पास जा कर नाक पे ऊँगली रख।  

“बड़ा आया, अपने आप को बड़ा गुणी समझता है ये रमेश ” चिल्लाने वाला महाशय बैठ तो गया लेकिन बगल में बैठी पत्नी से अपना गुस्सा जताया। “

“आप क्यों ऐसे लोगोके मुंह लगते हो? में जानती हूँ इसकी पत्नी उषा जो पिछले पांच साल से हमारे लोकल गुरु सुरेश भाई से सीख रही है लेकिन गरबा के टाइम तो में ही अच्छा गा लेती हूँ, हाँ।    उसकी हैसियत ही नहि मेरे साथ मुकाबला करने की ” 

कलाकारों का  ट्यूनिंग और १० मिनट चला।  

रमेश भाई ये मौक़ा क्यों गवांये ? कलाकारों की और एक स्मित करते करते एक नज़र डाल के सीधे माइक के पास,

“भाईओ और बहनो, थेंक्स फॉर योर कॉपरेशन।   जब तक ये कलाकार अपना ट्यूनिंग कर लें, उनकी परमिसन से  दो बातें बता दूँ , प्लीज़।  अभी अभी खबर मिली है की हमारे प्रिय हंसराज भाई को डॉक्टर ने दवाई दे दी है और वो आराम फरमा रहे है। ” कुछ लोगो ने ताली बजाई 

“दूसरी ख़ास बात, ( कलाकार की और एक क्षमा भरी नज़र ) , ये साल की मेम्बरशिप जिन लोगोने अभी तक नहि रिन्यू की है उनसे मेरा अनुरोध है के बाहर एक स्पेसिअल काउंटर लगाया है वहां जाकर पेमेंट कर दें।  थैंक्स फॉर योर  कॉपरेशन। थेंक यु, थेंक  यु , थेंक यु। ” 

जैसे वो माइक से कुछ हटे  तो एक वॉलंटिअर भागा हुआ उनके पास आ गया और हाथ में एक छोटी सी चिट थमा कर कान में कुछ कहा।  

“ओह सोरी, ‘ नाक पर फिर अपना चश्मा लगाया, “गाडी नंबर MH 02 AJ 4567 हमारे हंसराज भाई की गाडी को ब्लॉक कर रही है तो प्लीज़ गाडी जिन महानुभाव की हो उनसे मेरा नम्र निवेदन है के उसे हटाएँ। ” 

रमेश भाई एक आखरी बार कलाकार की और क्षोभपूर्ण स्माइल करते हुए स्टेज से बिदा हो गए। 

बीचवाली लाइन से एक महाशय उठते दिखाई दिए और किसी  भी प्रकार के क्षोभ बिना अपनी मस्त चाल से हॉल से बाहर निकल गए।  

कलाकार अब बिलकुल रेडी।  

‘कौआ चला हंस की चाल”

शो अभी  बाकी है मेरे दोस्त।         

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Part 3:

उस्ताद मोहमद खान ने फिर अपने माथे पे हथेली रख झांक कर ऑडिटोरियम में बैठे हुए श्रोता गण की संख्या का  अंदाजा लगाया । बेचारा असलम खान ! बोर होते होते जम्भाई के अलावा और क्या करता  ? सज धज के एक जवान चुलबुली सी लड़की स्टेज पे तानपुरा बजाने हाजिर हुई।  ऐसे में  मोहन भाई जैसे अनेको श्रोताओं  को स्टेज की और घूर के नज़र थमाए रखने का बहाना मिल गया। 

मोहमद  खान ने अपनी उँगलियों को सा से मन्द्र सप्तक के ध तक गज से नाद छेड़ कर यमन राग का आरम्भ किया। असलम खान ने मोहमद खान की ये अदा पे आफरीन होने का भाव दिखा  कर अपना सर हिलाया । आगे वाली कतार में  मोहन भाई की  बगल में बैठे हुए गुणीजन के मुख से ‘ क्या बात है ‘ के उद्द्गार निकल पड़े। 

मोहन भाई, जिन की  समझ से ये बिलकुल बाहर था उन्होंने अपना मोबाईल फ़ोन झट से पेण्ट की जेब से निकाला।  आखिर अपनी बीबी का फोन था न ? “हाँ जी कहो में सुन रहा हूँ।——  हां हां यहाँ सब ठीक ठाक है। — क्या कहा ? —–हां भाई हां, मेरी फ़िक्र ना करें।  —- बबलू अब ठीक है ? –दस्त,  उलटी वगैरा  बंध हो गए ? नहीं में तो ये संगीत सम्मलेन में आया हूँ — कोई बात नहीं — महफ़िल अब शुरू नहीं हुई है —कलाकार अब भी अपना साज ट्यून कर रहे है। —–“

बगल में बैठे गुणीजन ने मोहन भाई के कंधे पर हाथ रख कर हलकी सी चेतावनी दी , “आता गप बस “

मोहन भाई सहम उठे 

ऐसे तो ऑडिटोरियम में कई मोबाईल फ़ोन की जुगल बंदी चल रही थी लेकिन उस्ताद अपनी कला पेश करने में लगे हुए थे और तबला नवाज़ असलम खान ने हमेशा की तरह उबाऊ कवायत शुरू कर दी। उनको खुशहाल है ये नाटक करना  पड़ता है न ? जब तलक मुख्य कलाकार अपना आलाप वगैरा समाप्त न करें तब तक कभी अपने हाथो को बदन से सटा कर  मुस्कुरा देना, कभी  तबले पर रखी हुई गद्दियाँ   ठीक है की नहीं वो देख लेना, कभी स्टेज की साइड में ऑर्गेनाइजर्स क्या कर रहें हैं वो देखने की कोशिश करना। बड़ी बोरिंग चेष्टाएँ है ये सब।  बुज़ुर्ग लोग कह गए की वहाँ बैठे रहनेसे श्रोता गण के साथ ताल मेल बनता है।  चलो सच ही होगा। 

अब तनिक  देखें हमारे माइक प्रेमी रमेश राठोड का क्या हाल है। 

स्टेज की साइड में एक छोटे स्टूल पे बैठ के मसाले दार, बेहद मीठी  चाय पीना तो बनता है न ? जहां से इर्द गिर्द  क्या गतिविधियां हो रही है, भैया ? ज्यादातर चेरमैन, वाइस चेरमैन, सेक्रेटरी, ट्रेजरर  सब अपने अपने मोबाईल में वॉट्सऐप पे लगे थे – लेटेस्ट मेसेज आ रहे थे – आदरणीय हंसराज भाई की तबियत अब कैसी है वगैरा।  इतना बड़ा हादसा हो गया तो अपने लोग फ़िक्र तो करेंगे। 

हमारे मुख्य कलाकार अब फॉर्म में आ गए थे और सप्तक के पंचम तक पहुँच गए थे।   श्रोता गण को उनको  देख के लगता होगा की उनकी आँखे बंध है लेकिन, आंख के कोने से असलम खान क्या कर रहे थे वो भी देखना पड़ता हैं ।  असलम खान का भी क्या कहना ? बड़े कलाकार के साथ बजाने  का जो मौक़ा मिला था वो  निभाने की फ़िक्र मुँह पे दिखनी चाहिए।  बड़े हुशियार असलम खान,  जो बार बार अपना सर हिला कर मोहमद खान के वादन की सराहना करते रहे। 

वहां ऑर्गेनाइजर्स अपनी समस्या को सुलझाने में लगे थे।  कलाकार के लिए छोटे शहर की होटल में रूम कन्फर्म हुई की नहीं ? कल प्रातः काल में कलाकारों को रेलवे स्टेशन पर छोड़ ने कौन बन्दा जाएगा ? किसी कारण वश आभार विधि कौन करेगा वो तय नहीं हो पा रहा था। वाइस चेरमेन को तैयार तो किया था की क्या बोलना – जैसे ” हम आभारी है आदरणीय हंसराज भाई के जिन्होंने अपना कीमती वक्त निकाल कर यहाँ आ कर हमारा हौसला बढ़ाया; दोनों कलाकारों का; तानपुरा पे  उँगलियों से अपनी  कमाल दिखाने  वाली हमारी सबकी लाड़ली और विधायक की बेटी का;  म्युज़िक  सिस्टम वाले भरत भाई का; ऑडिटोरियम के मालिक श्री पेस्तनजी बावा का;  गरमा गर्म कौचौड़ी  आयोजन कर समारम्भ को चार चाँद लगाने वाले हमारे सूरज मल जी का और आप सब श्रोता गण का जिनके कॉपरेशन के बिना ———–“

अब हुआ ये की रियाज़ के वक्त ग्रीन रूम में दोनों कलाकार ने जो अगणित चाय के कप अपनी सिस्टम में ढाल दिए थे वो अपना कमाल दिखाने  लगा। इधर मोहमद खान तो सारंगी वादन में इतने व्यस्त थे की उनको कुछ नहीं हो रहा था पर असलम भाई की स्थिति नाजुक थी।  वो करें भी क्या ? प्रसाधन कक्ष बाहर और ये अंदर स्टेज पे ! उनका जबरदस्ती बैठे  रहना आवश्यक था और अंदर प्रेशर बढ़ता जा रहा था। एक मौके की तलाश में असलम खान। मोहमद खान बड़ी मुद्दत के बाद तार सप्तक में प्रवेश कर चुके थे । श्रोता गण में कुछ गिने चुने गुणीजन लोग आनंद विभोर होते गए और असलम भाई ? लाख कोशिशों के बावजूद चैन नहीं था उनको। 

वहां  ऑडिटोरियम में : मोहन भाई की हालत कुछ कुछ असलम खान जैसी। जिग्नेशभाई आलाप में बहुत समझ है ऐसा दावा करते करते थक गए – अलबत्ता बारी बारी से अपना मोबाईल फोन पे नज़र मारते  रहे – शायद कोई इम्पोर्टेन्ट बिज़नेस मेसेज आ जाय।  आखिर वाली रो में बैठे साधारण जन समूह को को असाधारण लाइसेंस था – वो अँधेरे में पीछे के गेट से बहुत आराम से पलायन हो सकते थ।  और फिर वापस आ के मस्ती कर सकते थे। 

आखिर वो समय आ ही गया – आलाप समाप्त।  श्रोता गण में से कई लोगों ने   आलाप रुपी कष्ट से मुक्ति का तालिआं बजाकर स्वागत किया।मोहमद खान की मुखाकृति भावुक। असलम खान ने  सर हिला कर ‘बेमिसाल’ की मोहर लगा दी लेकिन उनका जिस्मी आलाप और उछलने की चेष्टा में। वीरता पूर्ण हंसी कहाँ तक बरकरार रखें ? कोई मौका मिल जाय कुछ पल के लिए बाहर दौड़ लगाने का !

भला रमेश भाई ये मौक़ा छोड़ते? उनका प्रिय माइक उनको बुला रहा था।  स्टेज से गुजरते आ गए वो, कलाकार की और एक सराहनीय नज़र और माइक पकड़ लिया। “क्या बात है खान साहेब, परम आनंद की अनुभूति करा दी हमें। (यहां मौक़ा देखते असलम ने उठके दौड़ लगाई प्रसाधन कक्ष की ऒर ),  बस आपकी अनुमति से एक ही जरूरी घोषणा करना चाहता हूँ।  

माननीय श्रोता गण, खान साहेब को बहुत बहुत शुक्रिया कहते हुए में निवेदन करना चाहता हूँ की आप सभी अपनी अपनी सीट पर बैठे रहे क्योंकि आप जिसका बेसबरी से इंतजार कर रहे है वो कचौड़ियां अभी रेडी नहीं है। प्रोग्राम की समाप्ति होने पर आप सभी लोगों को कचौड़ियों का रसास्वाद जरूर हो जाएगा ।  थेंक यु फॉर ओर कॉपरेशन, थेंक यु, थेंक यु, थेंक यु ” 

अब स्वागत करने की बारी है तबला नवाज़ असलम खान की — लेकिन————— वो नज़र नहीं आये ! — वो बस आते ही होंगे। “

असलम खान की वापसी स्टेज पर उसी समय ;   रमेश राठोड के इशारे पर  श्रोता गण ने तालियां बजा कर स्वागत किया। असलम खान  सब का अभिवादन करते अपनी बैठक पे बिराजमान। 

अब फिर से साज मिलाने का दौर शुरू हुआ।  इस बार मोहनभाई ने अपनी उलझन को सुलझानेकी कशिश नहीं की।  बगल में बैठे हुए गुणीजन का खौफ जो था। 

हमारे रमेश भाई ने कॉर्डलेस माइक से स्टेज की साइड से भी घोषणा की ” सबसे बिनती है की जब कलाकार सुर मिला रहे है तो शांति बनाये रखे।  थेंक यु फॉर योर कॉपरेशन, थेंक यु, थेंक यु, थेंक यु। “

सुर मिलाते  मोहमद खान की तीखी नज़र असलम पर पड़ी, जैसे कह रही थी उन्हें “बेटा  तू आज देख  लेना, जरा संभलके । नानी  याद  आ  जायेगी  आज “

असलम खान ने एक विरक्त भावसे से स्मित किया और अपने तबले  पर एक जोर दार हाथ की थपाट लगा कर सुर मिला लिया। 

तबले के संगत में संगीत बहने लगा तो लोगो को भी कुछ अच्छा सा लगा। परम्परा अनुसार असलम खान ने तबले पर आवर्तन बजाने शुरू किये , लेकिन जब एक के बाद पांच आवर्तन तक बात पहुंची तो मोहमद खान को अपना मुखड़ा बजाते रहना पड़।  पब्लिक खुश – तालियां बहुत  देर तक बजती रही  लेकिन मोहमद खान ने मुंह बनाया ।  ‘असलम को चेतावनी देने के बावजूद उसको अकल नहीं आयी’ 

प्रोग्राम के चलते कई ऐसे पड़ाव आये जब दोनों कलाकार ने मिलके अपने रियाज़ किये हुए तानें  सम पे लाकर कुछ देर अटका दि।  गुणीजन ज़ूम   उठे  लेकिन हमारे मोहन भाई हर बार ये समझे की बस अब समाप्त हो गया। वो इतने बोर हो चुके थे की बीचमे उठें  या ना  उठें  ये उलझन बर्दास्त  करना बड़ा मुश्किल बन रहा था। दोनों कलाकार अपनी बेरूखी को भूला  कर बजाने में व्यस्त थे जबकि तान पूरा बजाने वाली लड़की इतनी सज धज के आयी थी की स्टेज की तेज लाइट से पसीने से परेशान हो गयी । 

यहाँ साज बज रहा था वहाँ ऑडिटोरियम में लोगो के मोबाइल बजना निरंतर चालु था। 

दोनों कलाकारों ने एक लम्बी सी तिहाई ले कर प्रोग्राम समाप्त किय।  श्रोता गण ने खड़े हो कर भाव विभोर कलाकारों का अभिवादन किय।  

जिग्नेश भाई ने पीछे की रो में बैठी उनकी पत्नी को आवाज दे कर बुलाया लेकिन मोहन भाई के पास इतना समय कहाँ? उठ कर वो दौड़ पड़े साइड की एग्जिट गेट की ऒर, अपनी मंज़िल की ऒर। बगल में बिराजमान गुणीजन एक और उलझन में फंसे थे – कचौड़ी खाने  बाहर जाना चाहते थे लेकिन इंटरवल के बाद उनका स्थान कोई और छीन ले तो? तब उनकी पत्नी एक फरिश्ता बन कर बोली “ये लीजिये, में घर से कांदे पोहे बनाकर लाई हूँ ” पत्नी ने हाथ में एक प्लास्टिक का चमच थमा दिया वो लेते साहब कृतग्य हो गए। ईश्वर करे सबको  ऐसी पत्नी मिले। 

बाहर, कचौड़ी के काउंटर पर हाथापाई हो रही थी। मोहन भाई ने  चालाकी से लाइन में अपना पहला स्थान ले लिया था लेकिन पीछे से धक्का इतना जबरदस्त लगा की कचौड़ी की चटनी कुर्ते पे छलक उठी।  उसी वक्त न जाने कहाँ से रमेश भाई टपक पड़े ” अरे मोहन भाई प्रोग्राम में मज़े तो आयी न?” ये पूछते रमेश भाई फिसले और मोहनभाई को भी गिराते चले।   सब सत्यानाश। 

“थेंक यु , रमेशभाई प्रोग्राम बहुत अच्छा था लेकिन घर से मेसेज आया है की कोई इम्पोर्टेन्ट गेस्ट आएं है तो घर जाना पडेगा ” 

 “कोई बात नहीं, मोहन भाई,   आते रहना अब हमारे प्रोग्राम में। “

“हाँ बिलकुल” – बता कर मोहनभाई ऑडिटोरियम से बाहर !

अब बेचारे  कलाकारों को इंटरवल के बाद मोहनभाई की प्रेरणा बिन बजाना पडेगा। 

भागो  मोहन प्यारे , भागो—

Part 4:

उदार दिल रमेश भाई ने मध्यांतर के लिए १० मिनट का समय दिया था वो उन लोगो के लिए था जिनके दिलको कचौड़ी आ ज तक छू नहीं पायी  थी । ३० मिनट तक खुली हवा में घूमते रहना तो बनता ही था।  एक के बाद एक ६ बार रमेश भाई के आग्रह को सन्मान देते हुए हामरे श्रोताओ सभागृह में प्रवेश करने लगे। 

“जिग्नेश भाई मध्यांतर के बाद आप तो पोग्राम देखने अंदर पधार रहे है ना?”  ५० से ऊपर उम्र लेकिन बाल कोयले की तरह काले ऐसे खुश मिजाज सेवंती लाल बोले ? गुणीजन होने का दावा करने वाले जिग्नेश भाई कुछ बताये इस से पहले मृणालिनी, सेवंतलाल की पत्नी ने उत्तर देना उचित समझा, ” बिलकुल पधारेंगे जिग्नेश भाई, हमारे पोते पार्थ को जो प्राइज़ मिलने वाला जो है ” 

मृणालिनी ने यकायक ऊँगली पकड़ पीछे चलने वाला  पार्थ, जो बेचारा कुल्फी कॉर्नर को बड़े चाव से देख रहा था , उसको आगे कर दिया, “नमस्ते करो बेटा अंकल और आंटी को” 

“नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी” 

“क्यों नहीं क्यों नहीं? अरे, कितना बड़ा हो गया ये? बहुत प्यारा बच्चा है। जब से हमारे सेवँतीलाल  साहब चेंबर ऑफ़ कॉमर्स के प्रेसिडेंट जो बने है आप लोग तो बस आते ही कहाँ हो?” जिगनेश भाई की पत्नी ने पार्थ के गाल को हलके से थप थपाया।

अब ये मत पूछिए की उत्तर भारत की मृणालिनी देवी किस तरह सेवँतीलाल की अर्धांगना बनी – यह लव स्टोरी किसी दिन जरूर बताऊंगा, लेकिन इनकी वजह से शहर की सभी महिलाओ को हिंदी में बात करना बनता था।  

“अरे क्या  बताऊं बहनजी, मन तो बहुत करता है पर इनको  टाइम ही कहाँ ? ” मृणालिनी का सेवँतीलाल की और मीठा गुस्सा! 

रमेश राठोड की आग्रहभरी आवाज हॉल में गूँज उठी। बेचारे जिग्नेशभाई! मध्यांतर के पश्चात वहां अड़े रहना टालना चाहते हुए भी सेवँतीलाल जैसे बिज़नेस मैन को भला कैसे टाल सकते थे? आखिर बिज़नेस बिरादरी में कौन माइका लाल ऐसे सोच भी सकता था? 

लेकिन कचौड़ी दबानेके पश्चात कुछ बहादुर बन्दे थे जिन्हें हॉल में वापस आनेकी जल्दी थी। आखिर उनके बेटे बेटिओं

 को प्राइस जो मिलनेवाला था ! याद रहें जो नहीं आए उन सबों को घर में इम्पोर्टेन्ट गेस्ट थे। तभी तो ! 

चलिए ग्रीन रूम में उस्तादों का क्या हाल था? अनगिनत कचौड़ी प्लेट्स  खाने के बाद वो ठुमरी और भैरवी बजानेके लिए बुलावे के इंतजार में, चुप चाप। 

ऑर्गेनिजर्स  बड़ी उलझन में। कड़ी मेहनत के फलस्वरूप एक तगड़ा सा डोनेशन द्वारा आदरणीय हंसराज भाई को चीफ गेस्ट बनाके लाये थे लेकिन विधाता को ये मंजूर  कहाँ? हादसे के बाद वो अपने घर में अपने सेवक से रिक्लाइनिंग कुर्शी में बैठे बैठे मालिश करवा रहें थे।  

अब बहस ये हो रही थी की चीफ गेस्ट की जगह किसको दिया जाय जिनके कर कमलों से प्राइज़ वितरण किया जाय।  समय निकला जा रहा था। रात के दस बजने में चंद मिनट्स बाकी! 

आखिर सेवँतीलाल मान ही गए चीफ गेस्ट की जगह पर बैठने के लिए – उन्होंने डोनेशन कितना दिया वो अगले साल की जनरल मीटिंग में बताया जाएगा। 

सेवँतीलाल खुश और जाहिर है मृणालिनी देवी अधिकतर खुश। 

जब पर्दा  खुला  तो हॉल में २५ – ३० उपस्थित। पहली दो रोज़ में समा गए। सभी आतुर। स्टेज पे कुछ कुर्सियां और आगे एक लंबा सा टेबल, जिसके ऊपर २५ छोटी बड़ी चमकती ट्रॉफियां।  

रमेश भाई फिर एक और बार माइक पे नज़र आये। 

“लेडीज़ एन्ड जेंटल  मैन, क्षमा चाहते है हम। सबसे पहले दो जरूरी सूचनाएं । 

जिग्नेश भाई सोचने लगे “कही मेरी गाडी सेवंती लाल की गाडी को ब्लॉक तो नहीं कर रही है?”

‘रमेश राठोड की अदा का क्या कहना? ” हमें बड़ा अफ़सोस है की समय बहुत व्यतीत हो गया है और अभी अभी खबर आईं है के संगीत प्रोग्राम वगैरा रात के दस के बाद चालु रखना कानूनन अपराध बनता है।  हमें यकीन है के दोनों उस्तादों को सुन ने का मौक़ा हम जल्द लेके आएंगे।” 

यह सुन कर मुश्कीलसे दो सच्चे गुणीजन बैठे हुए थे वो हॉल से निकल गए – साथ मैं बड़ी पर्स वाली महिला शामिल। 

“दूसरी सूचना – आप सबों को बताते हुए हमें बड़ी ख़ुशी हो रही है के प्राइज़ वितरण के लिए हमारे अपने श्री सेवँतीलाल ने हामी भर दी है।” फिर बड़ी कुर्शी पे बैठे  सेवँतीलाल की और देखते हुए “संस्कारी नगरी की पूरी जनता की और से हम आपका अभिवादन करते है” 

चीफ गेस्ट ने हॉल मैं बैठे ‘गुणीजनों’ को हाथ जोड़ कर नमस्कार किया। हॉल में केवल दो ही रो में गुजीजन बैठे थे।  मृणालिनी देवी ने गुरूर से चारों और नज़र घुमाई। पार्थ ने उठ कर तालियां बजाकर   अपने पूज्य पिता का हौंसला बढ़ाया। 

रमेश फिर चले ” और हाँ , कमेटी ने इस बार तय किया है की कॉम्पिटिशन में हिस्सा लेने वाले सभी बच्चों को कंसोलेशन प्राइज़ देना बनता है। ये सुझाव हमारे सबके चहिते स्थानीय संगीतकार श्री सुरेश भाई की और से आया था।  “

स्टेज के पीछे एक कोने में  बैठे संगीतज्ञ सुरेश भाई ने फीका सा हाथ हिलाया। 

” तो दोस्तों, अब इंतज़ार की घड़ियां ख़तम हुई।  

टॉप प्राइज़ जीतने वाली है —————————-नन्ही सी नंदिनी !” 

बिलकुल इसी वक्त चीफ गेस्ट की बगल मैं बैठे वाइस चेरमेन ने सेवँतीलाला के कान में कुछ कहना मुनासिब समझा।  श्रोता गण को हमेशा ये नज़ारा बड़ा गहन लगता है की न जाने ऐसी कौनसी बात होती है जो स्टेज पे बैठे महानुभाब को कान में कहनी होती है। बड़ी इम्पोर्टेन्ट होगी बात। 

तालियां। 

वो नन्हीसी नंदिनी स्टेज पे एक गलत कोने सी निकली और सीधी  सुरेशभाई, के सामने जा कर खड़ी हो गयी। आखिर वो तो अपने गुरु को ही पहचानेगी!  वाइस चेरमेन कुछ बौखला गए, उन्होंने नंदिनी का हाथ पकड़ उसको चीफ गेस्ट के सामने खड़ा  कर दिया।  नंदिनी ने श्रोता गण की और देख कर मुस्कुरा कर नमस्कार किया। 

फोटू खींचने वाले महाशय दौड़ते  हुए आये, एक खाली कुर्शी को घसीट कर पास ला कर ऊपर चढ़ गए और केमेरा फोकस किया तब चीफ गेस्ट उठे और नंदिनी को टॉप प्राइज़ प्रदान किया। 

“और अब, फर्स्ट रनर्स अप प्राइज —— पार्थ, आ जाओ बेटा” 

हॉल तालियों से गूँज उठा। 

बनारसी साडी और गहनों से सजी मृणालिनी देवी अपनी जगह खड़ी हो गयी और एक यादगार तस्वीर खिंच ही ली अपने लाडले बेटे को अपने पिता से प्राइज़ लेते हुए । वो बैठी तब तलक  तालियां गूंजती रही। सभी लेडीज़ के अभिवादन स्वीकार करते करते बेचारी थक गयी। 

“अरे कॉम्पिटिशन के दिन बेचारे पार्थु को गले मैं इंफेक्शन हो गया था न? ये नंदिनी फंदिनी का क्या क्लास?” 

“सही बात है मृणालिनी देवी जी, कहाँ आपके पार्थ की बनारसी  गायकी और कहाँ ये सब ? ” जिग्नेश की पत्नी ने सुर मिलाया । मन ही मन उसने सेवँतीलाल -मृणालिनी को सह परिवार खाने पे बुलाने का प्लान बना दिया। 

प्राइज़ वितरण पूरे ४५ मिनट चलता रहा।  फिर हुई  चीफ गेस्ट की स्पीच, वाइस चेरमेन  का वोट ऑफ़ थेंक्स , आखिर मैं सब ने गले मिल कर अगले साल और अच्छा प्रदर्शन करनेकी कसम।   

कलाकारों को इज्जत से शहर की ३ स्टार होटल में पहुंचाया गया जहां होटल के रेस्टोरेंट में जो भी शाकाहारी खाना मिला वो दबा के सो गए। 

संगीत सम्मलेन की पूर्णाहुति पर बेजान हॉल की सफाई करते  युगल के होठों पर एक ही गीत था ” दुःख भरे दिन बीते  रे भैया अब सुख आयो रे—“

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संगीत सम्मलेन भाग 2

संगीत सम्मलेन भाग ३:


4 thoughts on “संगीत सम्मेलन – सम्पूर्ण कहानी

  1. The story is not real but through the story I have tried to present the picture of a typical Sangeet Sammelan. The satire is on everyone – the organizers, the audience, the artistes and many more

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